वक्फ की ज़मीनों को कब्जा मुक्त कराकर अपनी नमाज़ों का इंतेजाम खुद करें मुसलमान

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इस्लाहुद्दीन अंसारी

बड़े शहरों के हर रास्तों, हर चौराहों में ट्रेफ़िक जाम रोज की चकल्लस है। हर रोज़ हर शहर में हज़ारों की तादाद में ऐसे वाक़ये होते हैं जहाँ कई बेहद ज़रूरी काम इस दमघोंटू जाम की भेंट चढ़ जाते हैं। अगर आपको किसी भी छोटे बड़े शहर के बीचों-बीच मोटरसाइकिल या कार से दो किलोमीटर की यात्रा भी करनी हो तो बीच में कम से कम दर्जन भर जाम में फंसकर आपका दस मिनट का मामूली सा सफ़र दो घंटे के कष्टदायक सफ़र में बड़ी आराम से बदल जायेगा।

धार्मिक आयोजनों के अलावा भी शहर में जाम के पचास कारण हैं। धार्मिक आयोजनों का सड़कों पर होना या ना होना एक अलग प्रश्न है, दरअसल ये सरासर प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा है की जब आपने उस जगह किसी धार्मिक आयोजन की अनुमति दे रखी है, और कई जगह परंपरागत तरीक़े से वर्षों से ऐसे आयोजन होते आए हैं, तब आप ही ने ये सुनिश्चित करना है की ऐसे धार्मिक आयोजन से किसी भी आम जनमानस को किसी भी किस्म का कोई कष्ट ना हो और अगर इसके बावजूद भी ऐसे आयोजनों से किसी को कोई कष्ट होता है तो ये सीधा संबधित अधिकारी की गलती है और प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा है की जिसने आयोजन की इजाज़त तो दी पर आयोजन से किसी को किसी किस्म की तक़लीफ़ ना हो ये सुनिश्चित नहीं किया।

रोज़े की हालत में 44° टेम्परेचर में किसी को शौक़ नहीं लगता की वो तवे जैसी तपती सड़क पर बैठकर खुद का आमलेट सिर्फ़ इसलिए बनवाए की किसी को उससे असुविधा उतपन्न हो। दरअसल ये सरकार की खुद की नैतिक जिम्मेदारी है की वो सभी धर्मों के आयोजनों के लिये खुद ऐसी व्यवस्था करने प्रशासन को आदेशित करे की उससे किसी को किसी किस्म की कोई असुविधा ना हो। अब जब सरकार नहीं करेगी तो ज़ाहिर सी बात है आम आदमी को हर उस धार्मिक आयोजन से परेशानी होगी जो बीच सड़क पर आयोजित होते हैं या जिसमे एक साथ काफ़ी सारे लोग भीड़ की शक्ल में इकट्ठा होते हैं। अब वो आयोजन मुसलमानों का हो, हिंदुओ का हो, जैनियों का हो, सिक्खों का हो या दूसरे किसी और धर्म का।

जब एक साथ बहोत सारे लोग आवागमन के लिये बनाई गयी सड़क को वैकल्पिक रूप से किसी दूसरे काम के लिये इस्तेमाल करेंगे तो रोड पर आवागमन करने वाले आम आदमी को परेशानी तो होनी ही होनी है इसमें कोई दो राय नहीं और हाँ ऐसा नहीं है की ये परेशानी केवल जुमे की नमाज़ की वजह से सिर्फ़ हिंदू भाईयो को होती हो दरअसल ये परेशानी प्रभात फेरी से लेकर भंडारे, जागरण, कव्वाली, उर्स, शोभायात्रा और जुलूस तक़ ऐसे तमाम आयोजनों से उत्पन्न होती है जो सड़कों पर आयोजित होते हैं। और इससे प्रभावित लोगों में सभी धर्मों के लोग बराबर मात्रा में शामिल है।

पर अफ़सोस की बात ये है की पिछले कुछ दिनों से निशाने पर सिर्फ़ जुमे की नमाज़ है जो की सप्ताह में सिर्फ़ एक बार बमुश्किल 50-60 मिनट के लिये, अस्थायी तरीक़े से आयोजित की जाती है और वो भी सिर्फ़ इसलिए की जुमे की नमाज़ में नमाज़ियों की संख्या आम दिनों से ज़्यादा होने की वजह से मस्जिदों में पर्याप्त जगह नहीं होती जिस कारण लोग मजबूरीवश सड़क पर नमाज़ अदा करते हैं और उसमें भी ज़्यादातर जगहों पर ये ख़्याल रखा जाता है की किसी को किसी भी किस्म की कोई तक़लीफ़ ना हो।

और तो और मुसलमानों को ये करने की भी जरूरत ना पड़े अगर उनकी वक़्फ़ और मस्जिद की संपत्तियों पर भूमाफियाओं और सफेद-पोशों के अवैध कब्जे ना हो क्योंकि भारत में हमारे पुरखे हमारे लिये इतनी जागीरे तो छोड़ ही गये हैं की हमें आने वाली कई पीढ़ियों तक़ सड़कों पर नमाज़ अदा करने की आवश्यकता ना पड़े। पर अफ़सोस की खटारा सरकार के मुखिया ये तो कह देते हैं की मुसलमानों को सड़कों पर नमाज़ नहीं पढ़नी चाहिए पर ये कभी नहीं कह पाते की जिन्होंने मुसलमानों के नमाज़ पढ़ने की जगह को अवैध तरीक़े से कब्जा रखा है उसे छुड़ाने के लिये कोई सार्थक पहल करेंगे।

और जो सिरफ़िरे चिंटू ये तर्क़ गढ़ रहे हैं की मुसलमान जमीन कब्जाने की गरज़ से खुली जगह पर नमाज़ अदा पढ़ते हैं उन्हें चाहिए की एक बार गूगल करके भूमाफियाओं, अपने राजनैतिक आक़ाओं और दूसरे लोगों द्वारा कब्जाई गयी वक़्फ की संपत्तियों का डेटा निकालकर देख लें अगर उन्हें दिन में तारे ना नज़र आ गयें तो कहियेगा। अकेले खट्टर के हरियाणा के गुरूग्राम में जहाँ से इस सारे विवाद की शुरुआत हुई वहाँ पर हरियाणा वक़्फ़ बोर्ड के मुताबिक़ 9 मस्जिदों पर अवैध कब्ज़ा है। कहने का तात्पर्य ये की मुसलमान शौक़िया तौर पर सड़क पर खुली जगह नमाज़ नहीं पढ़ रहा है बल्कि उसके पीछे की मुख्य वज़ह मस्जिदों में जगह की कमी है, और जगह की कमी भी सिर्फ़ इसलिए है की सरकारें भूमाफ़ियाओं और नेताओं के गठजोड़ को आंखें मूंदें वक़्फ की संपत्तियां लुटने कब्जाने दे रही है।

बहरहाल मुसलमानों को चाहिए की वो कुछ ऐसी व्यवस्था बनाएं की जिन जगहों पर सड़क जाम करके नमाज़ अदा करने की नौबत आती हो (हालांकि ये बात सौ प्रतिशत सच है की ऐसी ज्यादातर जगहों पर इस बात का हमेशा ख़्याल रखा जाता है) और जिन रोडों पर ट्रेफ़िक का अत्याधिक दबाव रहता हो उस जगह सड़क पर नमाज़ ना पढ़कर स्थानीय जनप्रतिनिधि और प्रशासन से मिल कर कोई ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था कराने का आग्रह करे की आस-पास के किसी पार्क या ऐसी ही किसी जगह पर जुमे की नमाज़ अदा करने की परमीशन मिल जाए ताकि नमाज़ की वजह से होने वाले ट्रेफ़िक जाम से आम लोगों को राहत मिल सके।

जिससे की ना आपकी नमाज़ में कोई खलल पड़े, ना किसी को नमाज़ पर उंगली उठाने का मौक़ा मिले और ना ही इसकी वजह से किसी आम रहागीर को किसी किस्म की कोई परेशानी हो। और मेरे हिसाब से तो यही बेहतर रास्ता भी है, वरना ये नफ़रती चिंटू अपने आकाओं की सत्ता के नशे में चूर होकर आए दिन ऐसे ही कोई ना कोई ड्रामा खड़ा करके आपको परेशान करने का बहाना तलाशते रहेंगे। आपकी इबादत के एक बेहतरीन दिन को विवादित मुद्दा बनाने के नित नये बहाने तलाशते रहेंगे। इससे पहले की नफ़रत की ये हवा हरियाणा के गुरूग्राम से निकल दूसरे सूबों और शहरों का रुख़ करे आप एक जिम्मेदार नागरिक होने का सबूत देकर इनकी बोलती खुद ही बंद कर दीजिये।

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