भाजपा सांसदों की अगले चुनाव को लेकर बेचैनी

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भाजपा सांसदों की अगले चुनाव को लेकर बेचैनी

भाजपा के अनेक सांसद अगले चुनाव में पार्टी का टिकट पा सकेंगे या नहीं, इसे सोच सोचकर परेशान हो रहे हैं।

जाहिर सी बात है कि पांच राज्यों के चुनाव परिणामों की वजह से भाजपा को नये सिरे से अपनी रणनीति बनानी पड़ रही है।

लेकिन इस परिवर्तित रणनीति में पिछले पांच वर्षों तक सिर्फ गाल बजाने वाले सांसदों की छुट्टी कर जीत की संभावना वालों को मैदान में उतारने की कवायद एक बेहतर बात होगी।

दरअसल पिछले पांच वर्षों में विरोधियों ने भाजपा के लिए कोई खास चुनौती खड़ी नहीं की।

भाजपा और जनता के बीच खाई खोदने में पार्टी के ही अनेक नेताओं की प्रमुख भूमिका रही, जो जनता से पूरी तरह कटे हुए थे और सिर्फ विज्ञप्ति वीर बनकर पार्टी की लोकप्रियता की खाट खड़ी कर रहे थे।

दूसरी तरफ भाजपा के अनेक अनुभवी सांसदों और नेताओं ने बदले माहौल को भांपते हुए खुद को इस किस्म की गुटबाजी से पूरी तरह अलग कर लिया।

इनमें लालकृष्ण आडवाणी और डॉ मुरली मनोहर जोशी का नाम प्रमुख है।

झारखंड के संदर्भ में बात करें तो कभी राज्य में भाजपा के लिए नींव के पत्थर बने कड़िया मुंडा, राम टहल चौधरी और देवदास आप्टे सरीखे नेता भी सम्मान बचाने के लिहाज से दूरी बनाकर चले।

नतीजा है कि गाल बजाने वाले सांसदों ने पार्टी की जीत की संभावनाओं को बट्टा लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

सबसे ताजा जानकारी बिहार में सीटों के बंटवारे को लेकर है।

वहां राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने बिहार लंबे विवाद के बाद सीटों के बंटवारे का फार्मूला तय कर लिया है पर इससे भारतीय जनता पार्टी के नेताओं में बैचेनी फैल हो गई है।

यह तय है कि बिहार के पांच सदस्यों के टिकट अगले लोकसभा चुनाव में कटेंगे। यह तय होने के बाद कि बिहार की 40 सीटों में से भाजपा 17 और जनता दल यू 17-17 और रामबिलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी छह सीटों पर चुनाव लड़ेगी।

पासवान को राज्यसभा भेजने का भी फैसला किया गया है। अगले लोकसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे को लेकर विवाद शुरू हो गया था।

सीटों के बंटवारे को लेकर जीतनराम मांझी और उपेन्द्र कुशवाहा ने राजग छोड़ दिया है। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 22 सीटों पर कामयाबी पाई थी।

2009 जैसी सीटें जीतने के लिए ही पिछले लोकसभा चुनाव में केवल दो सीटें जीतने वाली पार्टी जदयू को 17 सीटें देने के लिए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह तैयार हुए हैं।

भाजपा के बेगूसराय से सांसद भोला सिंह का निधन हो गया है।

पटना से सांसद शत्रुघ्न सिन्हा और दरभंगा के सांसद कीर्ति आजाद ने लंबे समय से भाजपा और नरेंद्र मोदी के खिलाफ ही अभियान छेड़ रखा है।

भाजपा के पांच सदस्यो के टिकट कटने के कारण माना जा रहा है कि कुछ प्रमुख नेताओं के चुनाव क्षेत्रों में भी बदलाव हो सकता है।

नवादा से सांसद और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह को बेगूसराय से चुनाव लड़ने के लिए भेजा जा सकता है।

कुछ सांसद अपनी टिकट कटने की आशंका से अभी से पतले हुए जा रहे हैं।

फिलहाल कोई भाजपा आलाकमान के बारे कुछ कहने को तैयार नहीं है। यह स्थिति अन्य राज्यों सहित झारखंड की भी है।

लेकिन भाजपा को अगर दोबारा सत्ता में आना है तो इस किस्म के कठोर फैसले लेना उसकी मजबूरी भी है।

इसके बाद भी पार्टी को जनता के समर्थन के लिए अब भी सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की निजी लोकप्रियता का ही सहारा है।

इस एक लोकप्रियता के सहारे पार्टी क नैय्या तभी पार लग सकती है जब सारे विरोधी दल एकजुट ना हों और उनके अलग अलग चुनाव लड़ने की स्थिति में वोटों के विभाजन के फार्मूले पर भाजपा की जीत का रास्ता प्रशस्त होगा।

लेकिन उसके लिए भी जनता के बीच नापसंद किये गये और कोई काम नहीं करने वाले सांसदों को बदलना भी बदले राजनीतिक परिवेश में सत्तारूढ़ दल की बड़ी मजबूरी बन गयी है।

सत्तारूढ़ दल की इस कमजोरी को विरोधी भी अच्छी तरह भांप चुके हैं। लेकिन अपने हिस्से में अधिकाधिक सीट की सौदेबाजी ने इन दलों को कांग्रेस सीधे हाथ मिलाने से भी रोक रखा है।

भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पक्षों को डराने के लिए अब फेडरल फ्रंट के नाम पर फिर से तीसरा मोर्चा बनाने की कवायद हो रही है ।

इससे और कुछ न हीं तो कमसे कम सीटों की सौदेबाजी तो ठीक से होगी। इस माहौल में भी भाजपा को जीतने की क्षमता रखने वाले चेहरों को ही आगे लाना होगा

ताकि यह लड़ाई आसान हो वरना अनेक ऐसे चेहरे हैं जो पिछले पांच वर्षों में अपने कारनामों की वजह से नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के बाद भी अपने क्षेत्र में पार्टी को जीत नहीं दिला पायेंगे।

 

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