चंबल की वादियों में दफन है सलीम-अनारकली जैसी प्रेम कहानी, आखिर में मिली दर्दनाक मौत

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मुरैना,(शिवप्रताप सिंह)। शहजादे सलीम और कनीज अनारकली की प्रेम कहानी को लोग बेशक फसाना कहें, लेकिन इससे मिलती-जुलती एक हकीकत चंबल की वादियों में दफ्न है। ये दास्तान ऐसे कनीज की है, जिसकी खूबसूरती को देख उस जमाने के कितने ही नवाब और राजे-महाराजे उसे पाने के लिए बेकरार थे, लेकिन इस प्रेम कहानी में भी नायिका शहजादे को पा न सकी। आखिर में उसकी दर्दनाक मौत हुई। इस अधूरी प्रेम कहानी की नायिका का मकबरा मुरैना के नूराबाद कस्बे में मौजूद है।
कहानी ईरान से शुरू होती है। वैश्या सुरैया के यहां 17वीं सदी में एक बच्ची ने जन्म लिया। आवाज इतनी मीठी थी कि उसका नाम ही गन्ना रख दिया गया। गन्ना के पिता अली कुली और मां सुरैया ईरान से अवध में रहने चले आए। यहां अवध के नवाब सिराजोद्दौला ने गन्ना को देखा और एकतरफा प्रेम करने लगा, लेकिन गन्ना की आंखें पहले ही भरतपुर के शासक सूरजमल के बेटे जवाहर सिंह से चार हो चुकी थीं। पिता से सिराजोद्दौला ने गन्ना का हाथ मांगा, लेकिन गन्ना भागकर जवाहर सिंह के यहां पहुंच गई। सूरजमल ने इसका विरोध किया, जिसके चलते पिता-पुत्र के बीच युद्घ हुआ, जो बेनतीजा रहा। आखिर में गन्ना को सिराजोद्दौला के हवाले कर दिया गया।
गन्ना को नहीं मंजूर थी शर्त

सिराजोद्दौला का विवाह दिल्ली के अक्रांता बादशाह अब्दुल शाह के दूर के रिश्ते की बहन उमदा बेगम से हो गया। उमदा ने शर्त रखी कि गन्ना सिराजोद्दौला की पत्नी नहीं, बल्कि कनीज बनकर रहेगी। इतिहासविद डॉ. मधुबाला कुलश्रेष्ठ के मुताबिक गन्ना को यह बात नागवार गुजरी और वह भाग कर ग्वालियर आ गई। जहां महादजी सिंधिया शासन करते थे।

महादजी थे वीरता के कायल
जवाहर सिंह को पाने में असमर्थ गन्ना महादजी सिंधिया के खुफिया विभाग में गुनी सिंह बनकर रहने लगी। एक दिन महादजी पर हुए कातिलाना हमले को विफल करते समय गन्ना की हकीकत महादजी के सामने जाहिर हो गई। इसके बाद वे गन्ना की वीरता के कायल हो गए और उन्होंने गन्ना की हकीकत जाहिर नहीं होने दी।

आबरू बचाने खा लिया जहर

सिराजोद्दौला ग्वालियर में मोहम्मद गौस के मकबरे पर आए हुए थे। गन्ना उसकी जासूसी के लिए गई थी, लेकिन सिराजोद्दौला ने चाल-ढाल से गन्ना को पहचान लिया। उसने सैनिकों को गन्ना को पकड़ने के लिए कहा। सिराजोद्दौला गन्ना को नूराबाद सांक नदी तक ले आया, लेकिन यहां गन्ना ने आबरू बचाने के लिए अंगूठी में मौजूद जहर खा लिया। बांग्ला साहित्यकार ताराशंकर बंदोपाध्याय की पुस्तक में उल्लेख मिलता है कि गन्ना की इस बदनसीबी से दुखी महादजी सिंधिया ने नूराबाद में 1770 में गन्ना बेगम का मकबरा बनवाया। जहां गन्ना की मातृ भाषा में लिखवाया गया-आह! गम-ए-गन्ना बेगम। यह पत्थर देखरेख के अभाव में गन्ना की कब्र के पास से चोरी हो चुका है।

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