अवाम में बेहतर हो रही है पाकिस्तानी अदालतों की छवि, नेताओं पर बिना किसी दवाब के फैसले सुना रहे जज

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नई दिल्ली: पाकिस्तान के अदालतों की छवि वहां के आमजन के जेहन में बेहतर हो रही है. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है पाकिस्तान के प्रधान न्यायाधीश (चीफ जस्टिस) मियां साकिब निसार. न्यूयॉर्क टाइम्स में छपे लेख के मुताबिक, ‘पाकिस्तान के प्रधान न्यायाधीश मियां साकिब निसार की छवि इस देश में अच्छी है, क्योंकि उन्हें संविधान की गहरी समझ है. कई मामलों में वे सख्ती दिखा चुके हैं.’ इस संबंध में अखबार ने चीफ जस्टिस से जुड़ी एक घटना का भी जिक्र किया है. अखबार ने लिखा, ‘एक मामले में प्रधान न्यायाधीश सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में देखे गए. वे मुकदमे की पड़ताल करने खुद व्यक्तिगत रूप से लाहौर के अस्पताल में पहुंच गए. वहां उन्होंने एक घटना में मारे गए युवक के पिता से कहा- अगर आपको यहां एवं पुलिस जांच से संबंधित किसी भी तरह की परेशानी महसूस हो तो सीधे मुझे फोन कर सकते हैं. ने पुलिस की खिंचाई करते हुए कहा कि उसकी लापरवाही के कारण पंजाब (पाकिस्तान) में मानव तस्करी की घटनाएं हो रही हैं.’

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पिछले कुछ महीनों में सरकार से संबंधित कई मामले सुप्री कोर्ट के दरवाजे पर पहुंचे हैं, जिसमें नवाज शरीफ और उनके परिवार से जुड़ा पनामा पेपर्स, नवाज शरीफ की पार्टी का केस भी शामिल है. पनामा पेपर मामले में नवाज शरीफ को प्रधानमंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ा. इतना ही नहीं उन्हें पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) पार्टी के परमुख पद से भी हटा दिया गया है. नवाज की पार्टी ने अपने नेता के ऊपर लगे सभी आरोपों से इनकार किया है और कहा है कि सुप्रीम कोर्ट किसी दबाव में फैसले ले रही है.

न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा, ‘पिछले कुछ दिनों में शीर्ष अदालत की सक्रियता में जिस तरह तेजी आई है, उससे नया वातावरण बनने लगा है. कई मामलों में वह ‘सीधे कदम’ उठा रही है. 64 वर्षीय जस्टिस निसार ने वर्ष 2016 के अंत में प्रधान न्यायाधीश की शपथ ली थी. वे एक मंच पर खंडन कर चुके हैं कि अदालत अपनी पसंद से मुकदमों की सुनवाई करती है. वे कहते हैं, जज किसी के दबाव में काम नहीं करते. सुप्रीम कोर्ट एवं निचली अदालतें अवमानना के मामलों में भी गंभीरता दिखा रही हैं. हाल ही में सत्तारुढ़ दल के सांसद नेहल हाशमी को अवमानना का दोषी ठहराकर एक माह जेल की सजा सुनाई गई. बाद में हाशमी को माफी मांगनी पड़ी.’

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न्यूयॉर्क टाइम्स ने पाकिस्तान के राजनीतिक विश्लेषक एवं स्तंभकार मुशर्रफ ज़ैदी के हवाले से लिखा, ‘नवाज शरीफ तो जुलाई 2017 से लगातार कोर्ट के खिलाफ बोल रहे हैं. जबकि कोर्ट ही उन्हें राहत दे सकती है और उनका राजनीतिक कॅरियर बच सकता है.’ दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट का कवरेज करने वाले स्थानीय पत्रकार मतिउल्लाह जान ने कहा कि न्यायपालिका का राजनीतिकरण हो गया है. उन्होंने कहा, ‘न्यायिक सक्रियता’ के कारण न्यायपालिका की छवि खराब हुई है, उसका राजनीतिकरण हो गया है.’

न्यूयॉर्क टाइम्स ने पाकिस्तान की अदालतों और सेना के बीच रिश्तों का भी जिक्र किया है. अखबार ने लिखा, ‘पाकिस्तान में अदालतों और सेना के बीच ‘तालमेल’ का लंबा इतिहास रहा है, लेकिन वर्ष 2007 में चीफ जस्टिस इफ्तिखार मुहम्मद चौधरी ने मुशर्रफ पर कार्रवाई करके इतिहास बदला था. परंतु आज वहां सुप्रीम कोर्ट में 38 हजार मामले लंबित हैं. 88 वर्षीय चर्चित मानवाधिकार कार्यकर्ता इब्न अब्दुर्रहमान कहते हैं, जजों को चाहिए कि वे खुद समस्याओं के समाधान की कोशिशों में न लगें. अब्दुर्रहमान को कुछ दिन पहले चीफ जस्टिस निसार ने चाय पर बुलाया. इस पर वे कहते हैं, चाय से बेहतर होगा कि वे न्याय प्रदान करें.’

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