अय्यारी : बेवजह भागती फिल्म जो खुद हांफती है और आपको भी हांफने पर मजबूर करती है

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लेखक : नीरज पांडे

कलाकार : मनोज बाजपेयी, सिद्धार्थ मल्होत्रा, नसीरुद्दीन शाह, अनुपम खेर, रकुल प्रीत सिंह, पूजा चोपड़ा, आदिल हुसैन, कुमुद मिश्रा

रेटिंग : 2/5

नीरज पांडे को लंबे-लंबे ट्रैकिंग शॉट्स बहोत पसंद है. बहोत मतलब, कई सारे ‘हो’ वाले बहोत. इसलिए उनकी हर फिल्म में ज्यादातर किरदार इधर से उधर चलते-फिरते-दौड़ते रहते हैं और कैमरा भी अपनी पीठ पर लाउड बैकग्राउंड स्कोर लादकर उनके आगे-पीछे या फिर साथ भागता रहता है. ‘अय्यारी’ में ऐसे ही शॉट्स की अति है, और इतनी कि सर दुख जाता है.

अगर सिद्धार्थ मल्होत्रा के किरदार को होटल में आकर तीसरे-चौथे माले पर मौजूद अपने कमरे में पहुंचकर एक फोन करना है और सीन में फोन पर हुई बात ही महत्वपूर्ण है, तो नीरज पांडे सीधे काम की बात पर नहीं आते. वे होटल के मुख्य द्वार से लेकर कमरे में पहुंचकर फोन उठाने तक का लंबा शॉट लाउड बैकग्राउंड स्कोर के साथ शूट करते हैं और ऐसा सिर्फ गिने-चुने दृश्यों में करते तो हम इतना लंबा विवरण यहां नहीं लिख रहे होते. हर मुख्य किरदार के साथ ऐसा कई-कई बार होता है और ऐसे सीन खत्म होने के बाद उनका कोई अर्थ नहीं निकलता, न आप पर कोई प्रभाव पड़ता है और आप को सोचना पड़ता है कि कहीं ये राम गोपाल वर्मा वाली बीमारी के शुरुआती लक्षण तो नहीं.

सुस्त एडीटिंग की मारी इस फिल्म के नायकों से जोर से यह कहने का मन भी करता है – ‘और कितना चलोगे यार, फिल्म तो बिलकुल नहीं चल रही.’

बाबू देवकीनंदन खत्री के कालजयी उपन्यास ‘चंद्रकांता’ से अपना टाइटल और कथा का मर्म लेने वाली ‘अय्यारी’ के साथ यही दिक्कत भी है. वो दिल्ली से लेकर मिस्र, लंदन, कश्मीर तक दो घंटे 40 मिनट तक दौड़ती-भागती तो रहती है, लेकिन ज्यादातर वक्त कहीं जाती हुई नजर नहीं आती. फिल्म का पूरा पहला भाग – लगभग डेढ़ घंटे – कहानी, किरदारों व कॉन्फ्लिक्ट को स्थापित करने में खर्च किया जाता है और बेवजह लंबा होकर यह हिस्सा आपको हद अधीर करता है. न इस दौरान कोई रोचक ड्रामा रचा गया है, न कोई एक्शन-दृश्य रखा गया है (पूरी ही फिल्म में कोई कायदे का एक्शन-सीन नहीं है) और न ही रकुल और सिद्धार्थ के बीच का रोमांस ही रोम-रोम पुलकित करता है.

इंटरवल के बाद भी इसी अंदाज में फिल्म भागती है, लेकिन रोचकता यहां भी सिक लीव पर रहती है. आम आदमी की दुर्दशा व्यक्त करता क्लाइमेक्स भावनाओं में जरूर बहाता है, लेकिन वो इतना मजबूत नहीं है कि आपके अब तक रखे गए धीरज का फल मीठा दे सके. ऊपर से फिल्म आर्मी में घट चुके और घट रहे दो अलग-अलग तरह के भ्रष्टाचारों को आपस में जोड़ने की कोशिश करती है और खासतौर पर ऐसा करते हुए अपनी पटकथा को बिलकुल भी यकीनी नहीं बना पाती. इंटरवल से पहले जो हुआ उसका क्लाइमेक्स और उससे थोड़ा पहले आए रहस्योद्घाटन से क्यों व कितना लेना-देना है, इसे फिल्म को बेहतर तरीके से समझाना चाहिए था.

बतौर दर्शक, इसीलिए, ‘अय्यारी’ का हासिल सिर्फ इतना निकलता है कि बेवजह भागने वाली फिल्में अक्सर खुद ही हांफती हैं, और बढ़िया ट्रेलर दिखाकर दर्शकों को फंसाने के बाद उन्हें भी हांफने पर मजबूर करती हैं.

कथा की बात करें तो परदे पर ‘अय्यारी’ की कहानी तब शुरू होती है जब नेताओं और आर्मी के बड़े व पुराने अफसरों की फोन-टेपिंग कर मेजर जय दीक्षित (सिद्धार्थ मल्होत्रा) कई खुफिया सूचनाओं तक पहुंचता है. उसका सिस्टम पर से विश्वास उठ जाता है और व्ह्सिलब्लोअर बनकर वो आर्मी के अंदर मौजूद गंदगी को साफ करने निकलता है. फिल्म की इसीलिए तारीफ तो होनी ही चाहिए कि उसने आर्मी के अंदर मौजूद उस भ्रष्टाचार पर बात करने का हौसला दिखाया जिसके बारे में आज के अंध राष्ट्रभक्ति वाले दौर में कह-लिख पाना लगभग नामुमकिन है. हालांकि वो यह काम शऊर से नहीं कर पाई, लेकिन नेवरमाइंड, किसी ने किया तो.

बहरहाल, सिद्धार्थ मल्होत्रा इस क्रांतिकारी किरदार को अभिनीत करते वक्त दर्शकों का हाल बेहाल नहीं करते, ब्रेकिंग न्यूज यही है. अभिनय अपनी सीमित प्रतिभा अनुसार ही बेहद सीमित करते हैं लेकिन चूंकि अब वे परदे पर जंचते खूब हैं इसलिए उन्हें देखना सुहाने लगा है. ये भी कहते चलें कि एडवर्ड स्नोडेन आधारित/प्रभावित उनका ‘बेरोजगार’ किरदार इतने सलीके से महंगे कपड़े पहनता है कि एक अगर निर्देशक उन कपड़ों की दो-चार सिलाइयां उधेड़ देते, तो यह पात्र ज्यादा विश्वसनीय बन पड़ता.

फिल्म की सबसे बड़ी ताकत मनोज बाजपेयी हैं. और ये ब्रेकिंग न्यूज कतई नहीं है. जाहिर सी बात है कि आप सिर्फ उनके लिए ‘अय्यारी’ देख सकते हैं क्योंकि कड़क मिजाज ‘नो नॉनसेंस’ कर्नल अभय सिंह के रोल में वे पहाड़ों की हवा के मानिंद असर छोड़ते है. जैसे कि धीरे-धीरे ऊपर चढ़ते जाने पर पहाड़ों की हवा और ज्यादा निर्मल व सुहानी होती जाती है, वैसे ही ‘अय्यारी’ में जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, मनोज बाजपेयी पहले से ज्यादा बेहतर अभिनय करने लगते हैं. उनकी क्रूरता भी दिल लुभाती है, उनकी अपने काम के प्रति भक्ति भी, और जब सिद्धार्थ के किरदार के साथ वे वाद-विवाद करते हैं, तो वो दृश्य फिल्म के सबसे उम्दा लम्हे भी बन जाते हैं. बड़े दिनों बाद – ‘अलीगढ़’ व ‘सात उचक्के’ के बाद – उन्होंने इसी फिल्म में छक कर अपना अभिनय इंजॉय करने के मौके पे मौके दिए हैं. छोड़िएगा मत.

और फिर इसी फिल्म ने चौकीदार के बेहद छोटे से रोल में पुन:आल्हादित करने वाले नसीरुद्दीन शाह दिए हैं. उन्हें चरण स्पर्श!

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